संदेश

सावन में मेघा बरसे या ना बरसे पर हमारे नैना ज़रूर बरसते  है |ज़िंदगी में कुछ दर्द ऐसे होते है ज़िसकी दवा वक्त के पास भी नहीं होती |ज़िंदगी के कुछ घाव ऐसे होते है ज़िन पर अपनो के प्यार का मरहम भी असर नहीं करता |ये दर्द ,ये घाव  नासूर बन जाते है |इनका बस एक ही ईलाज है सहना और सहना |हां कभी कभी रोकर इस दर्द को कम किया जाता है ||                                  पर आज के अतिवादिता के दौर में रोना भी प्रतिबंधित सा हो गया है || जहां देखो खुश रहने और मुस्कारने के विज्ञापन े होते है और इसी का प्रचार प्रसार किया जाता है |मानो दुख और रोना जीवन का हिस्सा ही ना हो| मनुष्य की कुछ स्वाभाविक  क्रियायें होती है रोना भी उनमे से ही एक है |जैसे खुशी की कोई बात होने पर हंसी आना स्वाभाविक है वैसे ही ज़िंदगी में दुख आने पर रोना भी स्वाभाविक है |                               जिस रोने को लोग ज़िंदगी का नकारात्मक और कमजोर पक्ष मानते है उसे मै...
४७६ -------------१-------------- गर्भ में पल रही बच्चियों सुनो लगाकर कान | मेरी बातों पर भी धरो थोड़ा सा ध्यान , फिक्र रहती है तुम्हारी इसीलिये बांट रही हूँ ज्ञान| जन्म के बाद तुम्हारा जीना नहीं हैं आसान | -------------२------------- पृथ्वी पर जन्मी बालिकाओं मेरी बात पर गौर करो नन्ही सी तुम कली हो जानती हूँ तुम अभी अधखिली हो उम्र तुम्हारी महीनों में हो य़ा साल में सुरक्षित नहीं हो तुम इस संसार में हवस के भूखे भेडियों की नजरों से तुम बचा करो टॉफी ,चॉकलेट य़ा किसी और लालच में ना आया करो आसिफा ,मुन्नी ,गुडिया ,निर्भया  इनकी खता भी थी क्या | बस इतनी कि नारी शरीर था धरा प्यारी बच्चियों घर के बाहर खेलने में डरा करो घर में अपनी सलामती की दुआ किया करो || ------------------३--------------------------- स्कूल कालेज जाने वाली लड़कियों ज़रा  सावधान होकर घर से निकला करो अजनबियों से लिफ्ट लिया ना करो आँख कान हमेशा खुले रखा करो हर किसी की गतिविधियों को ध्यान से देखा करो ज़रूरत से ज्यादा विश्वास पहुंचा सकता है नुक़सान समझदारी ही है तुम्हारा सुरक्षा कवच आत्मविश्व...
४७५ "प्रेम पत्र -5" "" प्रियवर "" जेठ की इस तपती दुपहरी में जब हर कोई आसमां को तकता  है ,बादलों को घूरता है सिर्फ चंद बुंदों की आस में |,इसी मौसम में विरह अग्नि में झुलसते हुए ह्रदय  रूपी आकाश से कल्पना रूपी बादलों को माध्यम बनाकर प्रेम की बुंदों को शब्दों में पिरोकर तुम तक भेज रही हूँ ताकि जब  विरह वेदना रूपी आग जब तुम्हें झुलसाये तब इन प्रेम की बूंदों का सहारा लेकर सावन की रिमझिम फुहार तुम्हें तृप्त कर सके |        डियर चिंता बिल्कुल भी मत करना ये दूरियां कुछ नहीं बिगाड सकती हमारा | जेठ की धूप हो य़ा सावन भादो  की झडी  य़ा फिर हो माघ पौष की सर्दी  या हो किसी भी  मौसम की मार  , इन सब से तुम्हें  बचा लेगा मेरा प्यार ||                                             " तुम्हारी प्रियतमा "                                     ...
"उफ ये सपने !!" कुछ सपने अपने हो गये कुछ सपने ,सपने ही रह गये | कुछ सपने बनकर मुस्कान होठों पर छा गये || कुछ सपने बनकर आँसू गालों को सहला गये || कुछ सपने बनकर उम्मीदे मीलो सफर करा गये || कुछ सपने दिल की बगिया में हजारों गुल खिला गये |` कुछ सपने बनकर खुशबू जीवन को महका गये || #Anita Pal Sukhatri
"उल्लू बनाओ" जब भी मेरे पास खाली समय होता है उसको या तोमैं अपनी डायरी के साथ बिताना पसंद करती हूँ या बच्चो के साथ | बच्चा भले ही एक दिन का क्यूँ ना हो| मुझे  "बच्चे मन के सच्चे " बहुत भाते है | और मैं बच्चो से दोस्ती करने में बहुत  माहिर हूँ | एक ही पल में  बच्चा बन उनसे घुल मिल जाती हूँ | बच्चो की अपनी दुनियां, अपने शब्द  ,अपने अर्थ और अपना शब्दकोश | आज एक बच्चा दीदी आप बोर नहीं होते अपनी लाइफ से ?? मैं --- बोर क्यूँ ??? आप दिन भर बिजी रहते हो?? खेलते भी नहीं अपने friends के साथ ????? मेरे सब friends दूर दूर रहते है ना .... अच्छा तो आप उनको उल्लू तो खूब बनाते होंगी ??? उल्लू कैसे बनाते है frnds को?? मैने मासूम सी शक्ल बनाते हुए और माथे में बल ड़ालते हुए कहा | अच्छा आपके frnds गर्ल या बॉयस बच्चे ने पूछा ??? दोनो है ..... हां तो उल्लू कैसे बनाते है ??? मैने फिर से पूछा ... आपको उल्लू लड़के को बनाना है या लड़की को?? दोनो को बनाना बता दीजिये |(😂😂) अच्छा सुनिये ..... बच्चे के इतना कहते ही मैने अपनी हंसी को रोकते हुए ......हां हां बताईये ..... आप ना अपने ...
५६५ ख्याल तुम हो , ख्वाब तुम हो | सवाल तुम हो जवाब तुम हो | तुम चांदनी रात तुम सावन की बरसात | तुम मेरे जज्बात् मेरे जीवन की सौगात | तुम होली का फाग मेरे जीवन का राग तुम बसंत की बहार तुम यौवन का श्रृंगार || ~~अनिता पाल #सिर्फ_तुम #मिसयू
५६४ सुना था जिस उम्र के दौर से मैं अब  गुजर रही हूँ इसमें नींद उड जाया करती हैं ,किसी की प्रेम रोग के चलते तो किसी की ज़िम्मेदारियों के चलते |पर अजूबापन यहाँ भी देखने को मिला | नींद तो बस इर्द गिर्द ही रहती है |दोपहर लंच के बाद मिनी नैप ,जी हाँ वही मिनी नैप जिसके लिये मैने कई लोगो को spiritual सेमिनार अटेंड करते देखा है पर मैंने इसके लिए कभी प्रयास नहीं किया | रात में बिस्तर पर ज़ाते ही एक सेकेन्ड में नींद के आगोश में | किताब लेकर बैठो तो निद्रा रानी दौडी चली  आती है | प्रभु की कृपा है जवानी की उम्र में भी बचपन वाली नींद की दौलत हमारे पास है |                             जब मैने सुना था कि बडे होने के बाद नींद नहीं आती तो डर के कारण  नींद लाने का मंत्र याद कर लिया था |पर उसकी कभी ज़रूरत नहीं पडी ..|फिर भी सोने से पहले निम्न लिखित दो लाइने अक्सर गुनगुना लेती हूँ | "मुझे अपने सिरहाने पे थोडी सी जगह दे दो  मुझे नींद न आने की कोई तो वजह दे दो |" #अनितापाल
५६३ "हलचल " गर्भ में बेटी माँ से बात किया करती थी माँ भी बेटी के दिल की हर धडकन को सुना करती थी | बेटी जब पूछती "माँ धरती तो बहुत सुंदर होगी ??" माँ जवाब देती हाँ बेटी धरती तो बहुत सुंदर है परंतु धरती के लोग .........?(कहकर माँ थोड़ा रूक सी जाती ) हाँ बेटी यहां नदियां है ,पहाड है ,खेत खलिहान है यहाँ तो बिल्कुल ही एक नया जहान है || कुल मिलाकर धरती पर बहुत हलचल है | पैदा हुई जब बेटी तो चारो तरफ सन्नाटा था देखकर शांति चारो ओर बेटी के मन में प्रश्न उठा था | माँ आप तो कहती थी धरती पर बहुत हलचल है माँ ने कहा हाँ  बेटी , अभी तो ये तुम्हारा पहला ही पल है | धीरे धीरे बेटी बडी होती गयी सखियो संग गुड्डे गुडियां के खेल में खो गयी | एक दिन धूल से सने हुए माँ की गोद में आयी बोली माँ ये धरा तो उससे भी सुंदर है , ज़ितनी आपने थी बतायी || दबी जुबां  से माँ ने बेटी की हाँ में हाँ मिलायी जैसे जैसे बेटी बडी होती गयी ,माँ ने इस दुनियां की हकीकत उसे समझायी | इस धरा पर नारी का नहीं है सम्मान अपमान के घूंट वह पीती है दिन रात | क्योंकि यह है पुरूष प्रधान समाज नारी क...
रिश्ते बनाना जानती हूँ रिश्ते निभाना जानती हूँ | रूठना जानती हूँ अपनो को मनाना भी जानती हूँ | ज़िन्दगी के तूफानों को झेलना जानती हूँ दर्द एे दिल को छुपाकर मुस्कराना जानती हूँ | #अनितापाल
५५८ न केवल आपके द्वारा बोले गये वाक्य बल्कि आपके द्वारा लिखे गये शब्द भी आपका चरित्र बताते है | #अनितापाल