४७५
"प्रेम पत्र -5"
"" प्रियवर ""
जेठ की इस तपती दुपहरी में जब हर कोई आसमां को तकता है ,बादलों को घूरता है सिर्फ चंद बुंदों की आस में |,इसी मौसम में विरह अग्नि में झुलसते हुए ह्रदय रूपी आकाश से कल्पना रूपी बादलों को माध्यम बनाकर प्रेम की बुंदों को शब्दों में पिरोकर तुम तक भेज रही हूँ ताकि जब विरह वेदना रूपी आग जब तुम्हें झुलसाये तब इन प्रेम की बूंदों का सहारा लेकर सावन की रिमझिम फुहार तुम्हें तृप्त कर सके |
डियर चिंता बिल्कुल भी मत करना ये दूरियां कुछ नहीं बिगाड सकती हमारा | जेठ की धूप हो य़ा सावन भादो की झडी य़ा फिर हो माघ पौष की सर्दी या हो किसी भी मौसम की मार , इन सब से तुम्हें बचा लेगा मेरा प्यार ||
" तुम्हारी प्रियतमा "
नीलम
"प्रेम पत्र -5"
"" प्रियवर ""
जेठ की इस तपती दुपहरी में जब हर कोई आसमां को तकता है ,बादलों को घूरता है सिर्फ चंद बुंदों की आस में |,इसी मौसम में विरह अग्नि में झुलसते हुए ह्रदय रूपी आकाश से कल्पना रूपी बादलों को माध्यम बनाकर प्रेम की बुंदों को शब्दों में पिरोकर तुम तक भेज रही हूँ ताकि जब विरह वेदना रूपी आग जब तुम्हें झुलसाये तब इन प्रेम की बूंदों का सहारा लेकर सावन की रिमझिम फुहार तुम्हें तृप्त कर सके |
डियर चिंता बिल्कुल भी मत करना ये दूरियां कुछ नहीं बिगाड सकती हमारा | जेठ की धूप हो य़ा सावन भादो की झडी य़ा फिर हो माघ पौष की सर्दी या हो किसी भी मौसम की मार , इन सब से तुम्हें बचा लेगा मेरा प्यार ||
" तुम्हारी प्रियतमा "
नीलम
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें