७४६
(१)
जब जब मैं हुई निराश
किसी ने ना मुझको सहारा दिया
जब जब फंसी मैं ज़िंदगी के भंवर में
हर किसी ने मुझसे किनारा किया `|||
(२)
मैं लहरों सी गिरती और उठती रही
रह रहकर खुद से बिछुडती रही
बन योद्धा हालातों से लडती रही
मैं खुद ही बिखरती संवरती रही ||
(३)
ज़िंदगी से कभी शिकवा हुआ
कभी शिकायत हुई
कभी हुए तन्हा
कभी नयनो से बरसात हुई
वक्त के साथ भर गये घाव
कल तक थे तपे धूप में
आज सुकून की मिल गयी छांव ||
#AP
(१)
जब जब मैं हुई निराश
किसी ने ना मुझको सहारा दिया
जब जब फंसी मैं ज़िंदगी के भंवर में
हर किसी ने मुझसे किनारा किया `|||
(२)
मैं लहरों सी गिरती और उठती रही
रह रहकर खुद से बिछुडती रही
बन योद्धा हालातों से लडती रही
मैं खुद ही बिखरती संवरती रही ||
(३)
ज़िंदगी से कभी शिकवा हुआ
कभी शिकायत हुई
कभी हुए तन्हा
कभी नयनो से बरसात हुई
वक्त के साथ भर गये घाव
कल तक थे तपे धूप में
आज सुकून की मिल गयी छांव ||
#AP
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