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प्रेम पत्र -७

  "सिर्फ तुम "
                प्रियवर  
                           कई साल से "तुम " मेरा  रिसर्च का   विषय रहे हो |कई बार  मैने तुम्हे जंगली ,अनपढ़ ,आलसी ,मेरी जान ,मेरी ज़िंदगी जैसे शब्दों से नवाजा है | ना जाने कितनी बार तुमने मेरी कल्पनाओं में आकार लिया है |  हजार बार "तुम " बिन दस्तक दिये मेरे ख्यालों में प्रवेश कर गये |कितने सावन बिन फुहार के गुजर गये ?? कितने फागुन बिन बहार के बेरंग लौट गये तुम्हारे इंतजार में | सालों से मैने तुम्हें  कभी दिल की धड़कन ,कभी मन की कल्पना में कभी ,कभी ख्वाबों में तो कभी पलकों के बीच छूपा कर रखा | आज जब "तुम " ख्वाब  से हकीकत बन गये  तो मेरे आसपास के लोगो की रिसर्च का विषय बन गये हो "तुम "|||
पिछले छ: साल में सात प्रेम पत्र ही लिख पायी उसके लिये क्षमा चाहती हूँ | ज़माने के डर को ताक पर रख मैं यूँ प्रेम पत्र लिखती रहूँगी ये मेरा वादा है |
              *****सिर्फ तुम *****
                                                 "तुम्हारी प्रियतमा "
                                                   ..................

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