ज़मीं -आसमां ,चाँद तारे
ये सब हैं दोस्त मेरे ||
घास का बनाके तकिया ,
निहारा जो मैने आसमां
इश्क मुझे बादलो से हुआ ||
इतराती हुई आयी जब घटा
सुरज दुबकने को मजबूर हुआ ||
प्रकृति के मनोरम सौंदर्य को
आँखो से मैने चख लिया |
इठलाती हुई गुजरी जब
हवा मेरे बगल से ...
पता मैने उसका पूछ लिया |
खिलते हुए फूलों ने देखा जो एक नजर मुझे
शरमा के सिर अपना झुका लिया |
धान की सुनहरी बालियों ने मन मेरा मोह लिया ||
धरती का ये हरा भरा आँचल जब लहराता हैं
सचमुच मन मेरा बहुत इतराता हैं |
प्रकृति का किया ज़िसने अदभुत श्रृंगार
उनको मेरा नमन बार बार ||
#anita_pal_sukhatri
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