"मैं बेवफा "
उन दिनों मैं छठी कक्षा में पढती थी ,जब मैने "बेवफा " शब्द पहली बार सुना था | तीन सहेलियां थी हम ...मैं ,वरीसा खान और ममतेश| ममतेश और वरीसा में झगडा हुआ .....गुस्साते हुए वरीसा ने कहा ....ममतेश .!!....बेवफा तू है ...मैं नहीं ....उस समय मुझे इस शब्द का अर्थ नही पता था ....पर आज बेवफाई के आरोप मुझ पर लगाये जा रहे .....चीख चीख कर मुझे बेवफा करार दिया जा रहा है....||
हाँ मैं स्वीकार करती हूँ .....
बाली ऊमर में मैं जब गाँव से शहर आयी थी ....तब तुमसे ही सबसे पहले दोस्ती हुई थी मेरी | याद है मुझे उस बन्द कमरे में घंटो तुमसे बात करके मैं अपनी तंहाई दूर किया करती थी | तुम्हारे सिवा था भी कौन मेरा उस अजनबी शहर में .....तुमसे ही तो मैं अपना सुख दुख साझा किया करती थी | जब मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशी के पल आते बांहो में भरके प्यार से चूम लिया करती थी तुम्हें |भूली नहीं हूँ संघर्ष के उन दिनों को जब हताश निराश हो मेरे आँसू तुम्हें तरबतर कर दिया करते थे |याद है मुझे लगभग एक दशक पहले की वो रात जब मैं पूरी रात रोयी थी और तुम्हें सीने से लगाकर सो गयी थी ......सच बताऊँ अगर तुम्हारा साथ ना मिलता तो बहोत मुशकिल हो जाता "यादो के शहर '" का सात साल का सफर |
आज मुझ पर बेवफा होने के आरोप अलमारी में बन्द "मेरी डायरी " के एक ढेर द्वारा लगाये जा रहे है |
मेरी प्यारी डायरी ऐसा नहीं की मैं तुम्हें भूल गयी ....य़ा मुझे तुम्हारी ज़रुरत नही ....ऐसा भी नही की अब मेरी ज़िन्दगी में तुमसे बांटने के लिये सुख दुख नही है ....बस बात इतनी सी है कि अब सुख दुख को सहने की शक्ति आ गयी ....उसको बांटने की ज़रुरत नही पड़ती .....ज़िम्मेदारियों के साथ बढते काम का बोझ और व्यस्त हो चुकी दिन दिनचर्या तुमसे दूर होने को मजबूर कर देती है ...| माई डियर तुम मेरे लिये खास थी और हमेशा खास रहोगी |
#मेरी_प्यारी_डायरी
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