"प्यार के बीज "
आधुनिक युग में प्यार की परिभाषा तो संकीर्ण हो गयी है पर प्यार के बीज भी खरपतवार के जैसे हो गये है जब तब ,यहाँ- वहाँ ,जहां तहां उग आते है |खरपतवार रूपी प्यार के ये बीज स्कूल ,कालेज ,बस ,ऑटो ,फेसबुक ,टविटर ,व्हाटसअप कहीं भी उग आते है |फेसबुक ,व्हाटसअप जैसे तमाम सोशल साइट्स इन खरपतवारों को खाद ,पानी प्रदान करते है और इनके कारण ही चंद दिनों में प्यार की फसल लहलाने लगती है | कभी तो प्यार की लहलाती हुई फसल चंद पलों में ही पानी के बुलबुले की तरह फुर्र हो जाती है और कभी '"योग्यत्म की उत्तरजीविता " को सिद्ध करते हुए आभासी दुनियां की मोहब्बत वास्तविक दुनियां का रूप ले लेती है |
संचार के क्षेत्र में हुई प्रगति और टैक्नोलोजी ने प्रेम के स्वरूप को ही बदल के रख दिया | दिनप्रतिदिन आ रही नयी टैक्नोलोजी के कारण "प्रेम की पतली गली "कब "नेशनल हाईवे" बन गयी पता ही नहीं चला | इधर लिखा संदेश पलक झपकते ही दूसरी तरफ पहुँच जाता है वो भी इस निश्चितता के साथ कि प्रेमी य़ा प्रेमिका के पास संदेश सही सलामत पहुँच गया और उसने पढा य़ा इगनोर किया इसकी जानकारी भी तुरंत मिल जाती है |"प्यार की तडपन " तो आजकल देखने को मिलती ही नहीं |
सच कहूँ तो आज का प्रेम बहुत आरामदायक और सुविधाजनक हो गया है | प्राचीन काल के प्रेमियों के साहस को सलाम करती हूँ | प्रेमिका से मिलने जाने के लिये प्रेमियों का "जान हथेली पर रख देना "| पिया मिलन की आस में नायिका का एक एक दिन गिनना | विरह की अग्नि में तडपना | मिले हुए प्रेमपत्रों को छुपाना और बेवक्त एक दुजे की याद आने पर उन पत्रो को पढकर मंद मंद मुस्काना |नायिका के पहलवान जैसे भाइयो से मार खाने का डर हमेशा बने रहना और प्यार पर हमेशा "संकट के बादल " मंडराते रहना |सुने हुए इस प्राचीन प्यार के बारे में सोचती हूँ तो डर लगता है | भला हो वीडियो कालिंग जैसी सुविधा का जिसने प्रेमियो की राह को आसान बना दिया |
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