अब तो लिखते हुए भी डर लगता है | कलम चलाने से पहले रुह कांप जाती है ,मन चीखने लगता है ,रोंगटे खडे हो जाते है ,दिल दहाड मार मार कर रोने लगता है |मन में असुरक्षा की भावना घुसपैठ कर जाती है |बस दोष इतना ही है ना कि महिला शरीर धारण किया है |
पर उस न्नही कली को  अपने उस शरीर का भान भी नहीं है | और उस कली को खिलने से पहले ही इस कदर रोंद दिया जाता है कि अंतरआत्मा भी कराह उठे | यूँ तो गर्भ में मारने का बहुत प्रयत्न किया जाता है |पर  अगर वहां से बच जाती है तो यहाँ नोच नोच कर मार दिया जाता है | मुन्नी और आसिफा तो चंद नाम है जो सबके कानों तक पहुँच ज़ाते है  हर रोज ना जाने कितनी मुन्नी और आसिफा दरिंदगी का शिकार होती है  और सब के सब मूकदर्शक बने रहते है |
               इस तरह की घटनाये सचमुच मुझे अन्दर तक तो झकझोर ही देती है साथ एक अजीब तरह का ड़र मन में घर कर जाता है | सोचने को मजबूर हो जाती हूँ कि दो दशक में नैतिकता का स्तर कितना गिर गया है या यूँ कहूँ कि नैतिकता का बुरी तरह पतन हो गया है |याद है मुझे अपना बचपन जब मैं खेतों से लेकर उस  बियाबान जंगल (स्थानीय भाषा में जंगलात ) तक अकेले ही घूमा करती थी | बहुत अच्छे से याद है  जब मैं हाईस्कूल में  थी तब भी दोनो और गन्ने के खेत के बीच से जाने वाली छोटी सी सड़क पर कई किलोमीटर का रास्ता हर रोज अकेली ही तय करती थी वो भी बिना किसी डर के | बचपन में ना जाने कितनी बार मैं और मेरी छोटी बहन गन्ने के खेत से चंद दूरी पर चारो और से खुले घेर में रात भर अकेले सोये होंगे |
पर आज के समय में तो सोचकर  भी डर लगता है| छोटी छोटी बच्चियां बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है यहाँ तक की घर और स्कूल में भी नहीं | बहुत अच्छे से समझती हूँ इस दर्द को क्यूँकि मैं भी एक लडकी हूँ और और व्यथित आत्मा से कहती हूँ दरिंदगी भरी मौत से गर्भ वाली मौत बहुत अच्छी है |
~~~~अनिता पाल
#feeling_sad

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