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विधाता से मैं अक्सर शिकायत करती थी ,
नवाजा है मुझको बहुतो हुनर से |
बनाया है मुझको बहुत जतन से ,
फिर क्यूँ नहीं कागज में रंग भरना सिखाया
सुन मेरी शिकायत विधाता ने फरमाया ||
प्रकृति के रंग बहुत ही खूबसुरत है ,
फिर तुम्हें कागजो में रंग भरने की क्या ज़रूरत है |
बस तुम प्रकृति की सुन्दरता को निहारो ,
इसी खूबसुरती को दिल में उतारो |
प्रकृति सौन्दर्य  प्रेरणा और प्यार है ,
इसी में छिपा जीने का सार है ||
विधाता की बाते दिल को भा गयी ,
मैं प्रकृति  के और करीब आ गयी ||
एक दिन सुनी मैने गुलाब की प्रेम  कहानी ,
जाना क्यूँ दुनियाँ है उसकी दीवानी |
रंगो से बाते करके हुआ सुखद अहसास ,
ज़िन्दगीं में घुल गयी प्यार  की मिठास ||
~~~~~~~अनिता पाल ~~~~~~~

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