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सजने संवरने दो इन नन्ही सी परियों को ,
फिर कहां मिलता हैं ये मौका बेवजह संवरने का |
जब पता भी न हो सुन्दरता की परिभाषा ,
और मन में हो संवरने की अभिलाषा |
बिना किसी कारण बिन्दी ,लिपिस्टिक और पायल ,
बहुत कशिश रखता हैं ये आँखो का काजल |
बडे होते ही सब शौक हो जाते हैं ओझल ,
व्यर्थ की भागदौड में जिन्दगी हो जाती हैं बोझिल |
फिर सजना संवरना भी मजबूरी होता हैं ,
ज़रूरी ना होते हुए भी ज़रूरी होता हैं |
मासूम सा बचपन ,भोली सी शरारते
बडे होते ही बदल जाती हैं सब आदतें |
लौटता नहीं ये बचपन गुजर जाने के बाद ,
सबको आता हैं अपना बचपन बहुत याद |
******"**"अनिता पाल ***"""*********
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