कल तक कली थी बाबुल की बगिया की
आज घर पिया का सजाने चली हूँ ||
छोड माँ  के आँचल की छाँव
ज़िंदगी की तपिश को सहने चली हूँ ||
जन्म लिया जिस घर में
आज वो हुआ  बेगाना
तलाशने नयी जगह आशियाना चली हूँ ||
वर्षों बुहारा जिस आंगन को
मन से सजाया जिस घर की दीवारों को
आज उसको अलविदा कह चली हूँ ||
बनके चिडियां चहकी
 कुछ दिन भैया के अंगना
आज उड़के परदेश चली हूँ ||
खेलती थी ,खाती थी
मस्ती से ईठलाती थी
आज बंध पवित्र बंधन में
रिश्तों की डोर थाम चली हूँ ||
सवाल बहुत है मन में आज
सिर पर है ज़िम्मेदारियों का ताज
आँखो में है आँसू
लबों पे है खामोशी
दस्तूर दुनियां का निभाने चली हूँ ||


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