पिछले एक महीने से ब्लोग में कुछ नहीं लिखा हैं ,मानो कलम जंग लगी तलवार सी हो गयी पर मन मस्तिष्क रूपी सागर में विचारो और भावनाओं की लहरे उठती हैं दिल रूपी किनारों से टकराती हैं और शांत हो जाती हैं |बहुत व्यस्त हो चुकी ज़िंदगी में भी दो बार ऐसा समय आता हैं जब आईने के सामने खुद से रूबरू होते हुए खुद पर गर्व कर लेती हूँ ,अपने स्वाभिमान पर इतरा लेती हूँ  अपनी प्यारी सी मुस्कान पर रीझ लेती हूँ ,अपनी आँखो में झांक कर शरमा लेती हूँ | निशा  के पहरे में निद्रा के आगोश में कुछ ऐसे जाती हूँ की सपनों को भी अनुमति नहीं होती डिस्टर्ब करने की |अगले दिन फिर वही दिनचर्या |ठहर सी गयी ज़िंदगी में भी हलचल होती रहती हैं |ये ज़िंदगी भी कभी बिजी तो कभी ईजी |सचमुच ये ज़िंदगी बहुत  खूबसुरत हैं |

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेटियां

अहिल्याबाई होलकर जयंती