पिछले एक महीने से ब्लोग में कुछ नहीं लिखा हैं ,मानो कलम जंग लगी तलवार सी हो गयी पर मन मस्तिष्क रूपी सागर में विचारो और भावनाओं की लहरे उठती हैं दिल रूपी किनारों से टकराती हैं और शांत हो जाती हैं |बहुत व्यस्त हो चुकी ज़िंदगी में भी दो बार ऐसा समय आता हैं जब आईने के सामने खुद से रूबरू होते हुए खुद पर गर्व कर लेती हूँ ,अपने स्वाभिमान पर इतरा लेती हूँ अपनी प्यारी सी मुस्कान पर रीझ लेती हूँ ,अपनी आँखो में झांक कर शरमा लेती हूँ | निशा के पहरे में निद्रा के आगोश में कुछ ऐसे जाती हूँ की सपनों को भी अनुमति नहीं होती डिस्टर्ब करने की |अगले दिन फिर वही दिनचर्या |ठहर सी गयी ज़िंदगी में भी हलचल होती रहती हैं |ये ज़िंदगी भी कभी बिजी तो कभी ईजी |सचमुच ये ज़िंदगी बहुत खूबसुरत हैं |
FB-141 "कि मेरा प्रेम पत्र पढकर ..." प्रियवर , नाशते में आलू के परांठे दही के साथ खाने के बाद जो नींद आयी ना उसको मैं लिख नहीं सकती अभी अभी जागी हूँ | दिल और दिमाग एकदम शुन्य और शांत हैं इसी शांति का लाभ उठाकर तुम्हे पत्र लिखने बैठी हूँ |दुआ करो को विघ्न ना आये और पत्र पूरा हो ज़ाये| सच बताऊँ डियर ....बचपन से ही मेरी बहुत इच्छा थी उच्च शिक्षा प्राप्त कर किसी अनपढ़े से शादी करने की हमेशा सोचती रहती थी कि कोई हाई स्कूल फेल तो मिल ही जायेगा कसम से तुम पांचवी पास को पाकर मैं फूली नहीं समा रही हूँ . .. वैसे तो 10 वीं पास भी अनपढ मैं ही आते हैं पर तुम तो सोने पर सुहागा हो मेरे लिये | प्रियवर बहुत विचित्र सी स्थिती हैं हमारे प्रेम के बीच |उधर तुमाहरे अग्रज शादी कर नहीं रहे हैं और इधर मेरे अनुज मुझे सुबह शाम एक ह...
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