पिछले एक महीने से ब्लोग में कुछ नहीं लिखा हैं ,मानो कलम जंग लगी तलवार सी हो गयी पर मन मस्तिष्क रूपी सागर में विचारो और भावनाओं की लहरे उठती हैं दिल रूपी किनारों से टकराती हैं और शांत हो जाती हैं |बहुत व्यस्त हो चुकी ज़िंदगी में भी दो बार ऐसा समय आता हैं जब आईने के सामने खुद से रूबरू होते हुए खुद पर गर्व कर लेती हूँ ,अपने स्वाभिमान पर इतरा लेती हूँ अपनी प्यारी सी मुस्कान पर रीझ लेती हूँ ,अपनी आँखो में झांक कर शरमा लेती हूँ | निशा के पहरे में निद्रा के आगोश में कुछ ऐसे जाती हूँ की सपनों को भी अनुमति नहीं होती डिस्टर्ब करने की |अगले दिन फिर वही दिनचर्या |ठहर सी गयी ज़िंदगी में भी हलचल होती रहती हैं |ये ज़िंदगी भी कभी बिजी तो कभी ईजी |सचमुच ये ज़िंदगी बहुत खूबसुरत हैं |
बेटियां
"बेटियाँ" खरपतवार सी होती हैं बेटियाँ , जहां तहां यहां वहाँ उग आती हैं खाद पानी बेटों में और लहराती हैं बेटियाँ| ज्यों ही ज़माती हैं ज़ड़े उखाड दूसरी जगह रोप दी जाती हैं बेटियाँ नयी मिट्टी में अनुकुलन कर , एक बार फिर ज़ड़े मजबूत कर लेती हैं बेटियाँ || सबके मन को शीतलता और प्यार की छाया देती हैं बेटियाँ | उम्र बढने के साथ ही देखभाल के अभाव में सूख जाती हैं बेटियाँ और अंततःकाल के झोके से भरभराकर गिर जाती हैं बेटियाँ #अनिता पाल
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