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बस इतनी सी है भारतीयों की आधुनिकता
प्यार मेंअपनी मर्जी और शादी में घरवालों की
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FB-141 "कि मेरा प्रेम पत्र पढकर ..." प्रियवर , नाशते में आलू के परांठे दही के साथ खाने के बाद जो नींद आयी ना उसको मैं लिख नहीं सकती अभी अभी जागी हूँ | दिल और दिमाग एकदम शुन्य और शांत हैं इसी शांति का लाभ उठाकर तुम्हे पत्र लिखने बैठी हूँ |दुआ करो को विघ्न ना आये और पत्र पूरा हो ज़ाये| सच बताऊँ डियर ....बचपन से ही मेरी बहुत इच्छा थी उच्च शिक्षा प्राप्त कर किसी अनपढ़े से शादी करने की हमेशा सोचती रहती थी कि कोई हाई स्कूल फेल तो मिल ही जायेगा कसम से तुम पांचवी पास को पाकर मैं फूली नहीं समा रही हूँ . .. वैसे तो 10 वीं पास भी अनपढ मैं ही आते हैं पर तुम तो सोने पर सुहागा हो मेरे लिये | प्रियवर बहुत विचित्र सी स्थिती हैं हमारे प्रेम के बीच |उधर तुमाहरे अग्रज शादी कर नहीं रहे हैं और इधर मेरे अनुज मुझे सुबह शाम एक ह...
दया धर्म की मूरत थी वह ,दुखियों की भगवान थी पिता माणकोजी शिन्दें ,माता सुशीला की गोद में खेली थी ! पाँच भाईयों की वह बहन अलबेली थी !! श्वसुर मल्हार राव होलकर की वह सेविका थी , खण्डेराव होलकर की वह पतिव्रता नारी थी !! मालेराव और मुक्ताबाई की वह ममतामयी माता थी , थे हजारों रूप उसके ,वह जन जन को भायी थी पतित पावन वह पूजनीय अहिल्याबाई थी !! हुई अवतरित जब धरा पर ,सारा कुटुम्ब मुस्काया था उसके अलौकिक तेज से भानू भी शर्माया था !! थी नहीं साधारण नारी ,वह देवी का अवतार थी , दरिद्र जनों के दुख दूर करती ,दुर्गा के समान थी शिवलिंग की पूजा करती सती के समान थी !! विद्वानों को तो वह साक्षात सरस्वती लगती थी मंत्रियों में वह स्वयं मंत्र बन जाती थी , शत्रुओं के समक्ष वह काली का रूप धर लेती थी !! देखकर दुखी जनों को ,वह माँ संतोषी बन जाती थी , सीता समान चरित्रवान और पतिव्रता नारी थी और क्या क्या कहुं उसे ,वह अदभुत चिंगारी थी!! सप्तपुरी ,चार धाम और बारह ज्योर्तिलिंगो को चमकाया था , भारत भर में उसने मन्दिर ,धर्मशाला और घाटों का निर्माण करवाया था , राम राज्य बना...
"बेटियाँ" खरपतवार सी होती हैं बेटियाँ , जहां तहां यहां वहाँ उग आती हैं खाद पानी बेटों में और लहराती हैं बेटियाँ| ज्यों ही ज़माती हैं ज़ड़े उखाड दूसरी जगह रोप दी जाती हैं बेटियाँ नयी मिट्टी में अनुकुलन कर , एक बार फिर ज़ड़े मजबूत कर लेती हैं बेटियाँ || सबके मन को शीतलता और प्यार की छाया देती हैं बेटियाँ | उम्र बढने के साथ ही देखभाल के अभाव में सूख जाती हैं बेटियाँ और अंततःकाल के झोके से भरभराकर गिर जाती हैं बेटियाँ #अनिता पाल
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